जेल का ऐसा खेल! जमानत किसी को, आजादी किसी और को; सात दिन तक कैसे सोया रहा सिस्टम?

बिहारशरीफ मंडल कारा में पहचान की चूक से खुली सुरक्षा व्यवस्था की पोल, तीन जेलकर्मी निलंबित; असली सवाल—जमानत पाने वाले कैदी के परिजन सात दिनों तक क्या करते रहे?
Report by Nawada News Xpress/ नवादा / सूरज कुमार
नवादा/बिहारशरीफ। अदालत से जमानत मिली एक बंदी को, लेकिन जेल के दरवाजे से बाहर निकल गया दूसरा कैदी! बिहारशरीफ मंडल कारा में हुई इस चौंकाने वाली चूक ने जेल प्रशासन की कार्यशैली और बंदियों की रिहाई से जुड़ी सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 24 सितंबर को हुई इस गड़बड़ी का खुलासा एक अक्टूबर को हुआ। यानी करीब सात दिनों तक जेल प्रशासन को यह पता ही नहीं चला कि जमानत पाने वाला बंदी जेल में बंद है और उसकी जगह दूसरा व्यक्ति बाहर जा चुका है। मामले में तीन जेलकर्मियों को निलंबित किया गया है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सिर्फ जेल प्रशासन की लापरवाही ही सवालों के घेरे में नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जिस कैदी को अदालत से जमानत मिली थी, उसके परिजन इतने दिनों तक क्या कर रहे थे? क्या उन्हें अपने व्यक्ति की रिहाई की जानकारी नहीं मिली, या उन्हें किसी स्तर पर गड़बड़ी का पता ही नहीं चला? फिलहाल, परिजनों की भूमिका को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

नाम और पिता के नाम में समानता बनी गड़बड़ी की वजह!
जेल सूत्रों के अनुसार, अस्थावां थाना कांड संख्या 203/26 और 201/26 के आरोपित सतीश चौहान उर्फ सतीश बिंद बिहारशरीफ मंडल कारा में बंद थे। इसी जेल में अस्थावां थाना कांड संख्या 362/25 का आरोपित चंद्रदीप चौहान उर्फ चंद्रदीप बिंद भी बंद था। बताया जाता है कि सतीश चौहान के पिता का नाम भी चंद्रदीप है। आरोप है कि नाम और पिता के नाम में समानता के कारण पहचान में गड़बड़ी हुई और जमानत सतीश चौहान को मिलने के बावजूद उनकी जगह चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना को रिहा कर दिया गया।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या बंदी की पहचान केवल नाम और पिता के नाम के आधार पर तय कर ली गई? क्या अदालत के जमानत आदेश, जेल के रिकॉर्ड और बंदी के अन्य पहचान संबंधी विवरणों का सही तरीके से मिलान नहीं किया गया? यदि निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ था, तो फिर इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई?

सात दिन तक जेल प्रशासन को क्यों नहीं लगी भनक?
24 सितंबर को हुई रिहाई की गड़बड़ी का खुलासा एक अक्टूबर को सहायक प्रवेश शाखा के कक्षपाल नवीश कुमार की रिपोर्ट के बाद हुआ। जांच में सामने आया कि जमानत पाने वाले सतीश चौहान जेल में ही बंद थे, जबकि उनकी जगह दूसरा बंदी बाहर निकल चुका था।
इस खुलासे के बाद जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया। दो अक्टूबर की सुबह वास्तविक रूप से जमानत पाने वाले सतीश चौहान को विधिवत रिहा कर दिया गया। वहीं, गलत पहचान के आधार पर जेल से बाहर निकले चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना ने भी उसी दिन स्थानीय अदालत में सरेंडर कर दिया। वह दोपहर करीब तीन बजे अदालत पहुंचा।
दोनों बंदियों की स्थिति स्पष्ट होने के बाद मामला और गंभीर हो गया। अब सवाल यह है कि यदि जेल से गलत व्यक्ति की रिहाई हुई थी, तो इसका पता लगाने में करीब एक सप्ताह क्यों लग गया? क्या इस दौरान बंदियों की नियमित गिनती और रिकॉर्ड का मिलान नहीं हुआ? या फिर कागजी प्रक्रिया में ऐसी खामी थी, जिसने इतनी बड़ी गलती को कई दिनों तक छिपाए रखा?

एक मामले में जमानत, दूसरे में लंबित थी जमानत!
सूत्रों के मुताबिक, चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना के खिलाफ दो अलग-अलग आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें से एक मामले में उसे जमानत मिल चुकी थी, जबकि दूसरे मामले में जमानत लंबित थी। इसके बावजूद उसके जेल से बाहर निकलने का मामला सामने आया।
यह तथ्य रिहाई से पहले बंदी के खिलाफ दर्ज सभी मामलों की स्थिति की जांच को लेकर भी सवाल खड़े करता है। किसी एक मामले में जमानत मिलने का अर्थ यह नहीं होता कि बंदी को अन्य मामलों में भी रिहा किया जा सकता है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि संबंधित बंदी की रिहाई से पहले उसके सभी मामलों और न्यायिक आदेशों का सत्यापन किस तरह किया गया।
तीन जेलकर्मी निलंबित, अब जिम्मेदारी तय होने का इंतजार
मामले की जानकारी मिलने के बाद जेल अधीक्षक ने संबंधित ड्यूटीकर्मियों से स्पष्टीकरण मांगा। उनके जवाब और प्रारंभिक जांच के आधार पर मुख्यालय को रिपोर्ट भेजी गई। इसी रिपोर्ट के आधार पर कारा महानिरीक्षक ने तीन जेलकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।
मुख्यालय कारा प्रशासन के अनुसार, जेल प्रशासन की ओर से चूक हुई है और जेल अधीक्षक की अनुशंसा पर तीन वार्डनों को निलंबित किया गया है। हालांकि, निलंबन की कार्रवाई के बाद भी कई सवालों के जवाब सामने आना बाकी हैं। जांच में यह स्पष्ट होना है कि गलती किस स्तर पर हुई, पहचान सत्यापन की प्रक्रिया में क्या चूक हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है।

परिजनों की चुप्पी या जेल प्रशासन की लापरवाही, जांच के घेरे में कई सवाल
इस पूरे मामले में जेल प्रशासन की जिम्मेदारी सबसे अहम है, लेकिन जमानत पाने वाले बंदी के परिजनों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि सतीश चौहान को 24 सितंबर को रिहा होना था, तो क्या उनके परिजन उनकी रिहाई का इंतजार कर रहे थे? क्या उन्हें यह जानकारी थी कि जमानत मिलने के बावजूद सतीश जेल में ही बंद हैं? या फिर उन्हें इस गड़बड़ी की जानकारी दो अक्टूबर को ही मिली?
इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी है। परिजनों की चुप्पी को किसी गड़बड़ी में उनकी संलिप्तता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन पूरे घटनाक्रम की समयरेखा और संबंधित लोगों की जानकारी की जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि गलती सामने आने में इतनी देर क्यों हुई।
फिलहाल, तीन जेलकर्मियों के निलंबन के बाद अब निगाहें जांच के निष्कर्षों पर टिकी हैं। अदालत ने जमानत एक व्यक्ति को दी, जेल से बाहर दूसरा निकल गया और करीब सात दिनों तक इस गलती का पता नहीं चला—आखिर इस पूरी व्यवस्था में चूक कहां हुई? यही वह सवाल है, जिसका जवाब सामने आना जरूरी है।

