भरत के त्याग और समर्पण में छिपा है रिश्तों की मजबूती का रहस्य, स्वार्थ नहीं प्रेम और सम्मान से बनते हैं संबंध : प्रभंजनानंद

प्रवचन में बताया भरत के जीवन का आदर्श, कहा- पद से बड़ा कर्तव्य और अधिकार से बड़ा होता है त्याग
Report by Nawada News Xpress/ नवादा / सूरज कुमार
नवादा। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का जीवन जहां आदर्श और मर्यादा की सीख देता है, वहीं भरत का चरित्र त्याग, समर्पण और निःस्वार्थ प्रेम की अनुपम मिसाल है।

भरत ने अपने आचरण से साबित किया कि महानता सिंहासन पर बैठने में नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों को निष्ठा से निभाने और अपनों के सम्मान के लिए अपने स्वार्थ का त्याग करने में है। उक्त बातें प्रवचन के दौरान प्रभंजनानंद ने कहीं।

उन्होंने कहा कि श्रीराम मर्यादा के आदर्श हैं, तो भरत त्याग और समर्पण के अनुपम प्रतीक हैं। जिनके हृदय में भरत जैसा प्रेम और जीवन में भरत जैसा त्याग होता है, उनके रिश्ते कभी स्वार्थ के मोहताज नहीं होते।

धनवान होना बड़ी बात नहीं, बल्कि दिल से उदार होना बड़ी बात है। किसी पद को प्राप्त करना महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि उस पद की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाना अधिक महत्वपूर्ण है।

प्रभंजनानंद ने कहा कि भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। सच्ची भक्ति तो अपने अहंकार को मिटाकर प्रेम, सेवा और सदाचार को जीवन में अपनाने का नाम है।

भरत जी ने स्वयं को राजा नहीं, बल्कि प्रभु श्रीराम का सेवक माना। उनका जीवन सिखाता है कि सेवा में स्वार्थ नहीं, बल्कि कर्तव्य की भावना होनी चाहिए। पद मिलने पर अहंकारी बनने के बजाय जिम्मेदार बनना चाहिए और अधिकार से अधिक कर्तव्य को महत्व देना चाहिए।

उन्होंने पारिवारिक रिश्तों की मजबूती पर प्रकाश डालते हुए कहा कि परिवार में प्रेम हो तो त्याग भी आनंद बन जाता है। रिश्तों को बनाए रखने के लिए एक-दूसरे को हराने या अपने अधिकार जताने की नहीं, बल्कि सम्मान और विश्वास की जरूरत होती है। सच्चा प्रेम किसी पर अधिकार नहीं जमाता, बल्कि उसके सुख और सम्मान के लिए अपना स्वार्थ तक त्याग देता है।

उन्होंने कहा कि भरत का चरित्र यह भी संदेश देता है कि सच्चे संबंध दूरी से कमजोर नहीं होते। जहां विश्वास, निष्ठा और समर्पण होता है, वहां अनुपस्थिति में भी प्रेम जीवित रहता है। परिवार की एकता स्वार्थ से नहीं, बल्कि त्याग, विश्वास और आपसी सम्मान से कायम रहती है।

प्रवचन के अंत में उन्होंने संदेश दिया कि मनुष्य की सबसे बड़ी महानता उसके धन, पद या अधिकार में नहीं, बल्कि उसके त्याग, उदारता और निःस्वार्थ भाव में छिपी होती है।

इसलिए जीवन में भरत के आदर्शों को अपनाकर रिश्तों को स्वार्थ नहीं, प्रेम और समर्पण के आधार पर मजबूत बनाना चाहिए।

