परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन चरित्र नहीं बदलना चाहिए : प्रभंजनानंद शरण

श्रीराम के वनगमन प्रसंग से दिया त्याग, समर्पण और मर्यादा का संदेश; कहा- राजा बनने से पहले अच्छा इंसान और धनवान बनने से पहले संस्कारवान बनिए
Report by Nawada News Xpress/ नवादा / सूरज कुमार
नवादा। प्रभु श्रीराम का वनगमन केवल राजमहल से वन तक की यात्रा नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली प्रेरणादायक सीख है। परिस्थितियां चाहे जितनी बदल जाएं, मनुष्य को अपना चरित्र, संस्कार और मर्यादा नहीं बदलनी चाहिए।

उक्त बातें अयोध्या से पधारे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध कथा व्यास पूज्य डॉ. स्वामी प्रभंजनानंद शरण जी महाराज ने श्रीराम कथा के दौरान कहीं।

उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम के सामने राजतिलक की तैयारियां थीं, लेकिन अगले ही क्षण वनवास की परिस्थिति आ गई। इसके बावजूद उनके चेहरे पर न क्रोध था, न शिकायत और न ही किसी के प्रति द्वेष।

उन्होंने पिता के वचन की मर्यादा रखने के लिए राजमहल का सुख त्याग दिया। यह प्रसंग सिखाता है कि सुख में अहंकार नहीं करना चाहिए और दुख में धैर्य नहीं खोना चाहिए।

स्वामी जी ने माता सीता, लक्ष्मण और केवट के प्रसंगों की व्याख्या करते हुए कहा कि माता सीता ने राजमहल के वैभव की अपेक्षा प्रभु श्रीराम के साथ वन का कठिन जीवन स्वीकार किया। लक्ष्मण जी ने व्यक्तिगत सुख का त्याग कर सेवा और समर्पण का आदर्श प्रस्तुत किया।

वहीं केवट ने प्रभु श्रीराम को गंगा पार कराने के बदले धन-दौलत नहीं, बल्कि उनके चरणों की सेवा का सौभाग्य मांगा। यह निष्काम प्रेम और सच्ची भक्ति का अनुपम उदाहरण है।

रिश्तों में विश्वास और जीवन में सेवा का महत्व
उन्होंने कहा कि सच्चे रिश्ते सुख-सुविधाओं से नहीं, बल्कि त्याग, विश्वास और समर्पण से चलते हैं। माता-पिता की सेवा, गुरुजनों का सम्मान और जरूरतमंदों की सहायता को बोझ नहीं, बल्कि अपना सौभाग्य समझना चाहिए।

प्रवचन के दौरान उन्होंने संदेश दिया कि राजा बनने से पहले अच्छा इंसान बनिए, धनवान बनने से पहले संस्कारवान बनिए और सम्मान पाने से पहले दूसरों का सम्मान करना सीखिए। त्याग से महानता, सेवा से सच्ची भक्ति और प्रेम से जीवन में प्रभु श्रीराम का वास होता है।


