शक्ति, बुद्धि और भक्ति का संगम ही जीवन की असली सफलता : प्रभन्जनानंद जी

सुग्रीव से मित्रता और समुद्र लांघने के प्रसंग से समझाया जीवन का मर्म, बोले- संकट में साथ देने वाला ही सच्चा मित्र, आत्मविश्वास और विवेक से मिलती है सफलता
Report by Nawada News Xpress/ नवादा / सूरज कुमार
नवादा। हनुमान जी का जीवन केवल अद्भुत शक्ति और पराक्रम की गाथा नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण, बुद्धिमत्ता, विनम्रता और अटूट भक्ति का अनुपम उदाहरण है।

उनका चरित्र मनुष्य को सिखाता है कि जीवन में केवल सामर्थ्यवान होना पर्याप्त नहीं, बल्कि अपनी शक्ति, बुद्धि और ज्ञान का उपयोग सही दिशा में करना भी जरूरी है। उक्त बातें प्रभन्जनानंद जी ने श्रीराम कथा के प्रसंगों की व्याख्या करते हुए कहीं।

उन्होंने कहा कि जीवन में ज्ञान का होना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी उसे सही समय और सही तरीके से प्रस्तुत करने की कला है। मधुर वाणी और विनम्र व्यवहार बड़े से बड़े व्यक्ति का हृदय जीतने की क्षमता रखते हैं। मनुष्य की प्रतिभा उसे सफलता दिला सकती है, लेकिन विनम्रता उसे समाज में सम्मान दिलाती है।

संकट में साथ देने वाला ही सच्चा मित्र
प्रभन्जनानंद जी ने भगवान श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सच्ची मित्रता की पहचान सुख में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में होती है।

श्रीराम ने सुग्रीव को संकट से उबरने का विश्वास दिया। सच्चा मित्र वही है, जो विपरीत परिस्थितियों में साथ खड़ा रहे। विश्वास, सहयोग और एक-दूसरे के दुःख को दूर करने का संकल्प ही संबंधों को मजबूत बनाता है।

हनुमान जी का समुद्र लांघना देता है आत्मविश्वास का संदेश
हनुमान जी के समुद्र लांघने के प्रसंग की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य में क्षमताओं की कमी नहीं होती, बल्कि कई बार आत्मविश्वास की कमी उसे अपनी शक्तियों को पहचानने से रोकती है।

हनुमान जी के मार्ग में मैनाक पर्वत, सुरसा और सिंहिका जैसी बाधाएं आईं, लेकिन उन्होंने हर परिस्थिति का सामना अलग-अलग बुद्धि और रणनीति से किया।

उन्होंने कहा कि हर समस्या का समाधान केवल शक्ति से नहीं होता। कहीं विनम्रता, कहीं बुद्धि, कहीं धैर्य तो कहीं साहस की आवश्यकता होती है। सफलता उसी को मिलती है, जो परिस्थिति के अनुसार अपने विवेक का इस्तेमाल करना जानता है।

शक्ति का उपयोग रक्षा के लिए, बुद्धि का उपयोग समाधान के लिए हो
प्रभन्जनानंद जी ने कहा कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर में हाथ जोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करने, जरूरतमंदों की सहायता करने और अहंकार का त्याग करने में भी प्रकट होती है।
उन्होंने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज मनुष्य के पास साधन बढ़ रहे हैं, लेकिन धैर्य कम हो रहा है। शिक्षा बढ़ रही है, लेकिन विनम्रता घट रही है। प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, लेकिन सहयोग की भावना कमजोर पड़ रही है। ऐसे समय में हनुमान जी का चरित्र समाज को जीवन की सही दिशा दिखाता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य के शरीर में बल, बुद्धि में विवेक, वाणी में मधुरता, व्यवहार में विनम्रता और हृदय में प्रभु के प्रति अटूट श्रद्धा होनी चाहिए। अपनी शक्ति से किसी को भयभीत करने के बजाय निर्बलों की रक्षा करनी चाहिए। बुद्धि का उपयोग दूसरों को भ्रमित करने के बजाय समस्याओं के समाधान में करना चाहिए और पद-प्रतिष्ठा का अहंकार छोड़कर समाज के लिए उपयोगी बनना चाहिए।
सेवा, विवेक और भक्ति से सार्थक होता है जीवन
प्रवचन के समापन में उन्होंने कहा कि हनुमान जी का जीवन हमें सिखाता है कि जब मनुष्य का बल सेवा में, बुद्धि विवेक में और हृदय प्रभु की भक्ति में समर्पित हो जाता है, तब उसका प्रत्येक कर्म लोकमंगल का माध्यम बन जाता है। यही जीवन की वास्तविक सफलता और मानव जीवन का सार है।

