भरत का त्याग, जटायु का साहस और शबरी की भक्ति में छिपा है जीवन का सार : प्रभन्जनानंद

कहा- धन, पद और प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण, सेवा और सदाचार से महान बनता है मनुष्य का जीवन
Report by Nawada News Xpress/ नवादा / सूरज कुमार
नवादा। श्रीराम कथा केवल भगवान श्रीराम के जीवन का वर्णन नहीं, बल्कि मानव जीवन को आदर्श बनाने वाली दिव्य जीवनशाला है। कथा के प्रत्येक प्रसंग में जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा छिपी है। उक्त बातें कथा के दौरान प्रभन्जनानंद ने कहीं।

उन्होंने भरत जी के चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि भरत का त्याग निष्काम प्रेम और समर्पण का अनुपम उदाहरण है। सहज ही अयोध्या का राजसिंहासन प्राप्त होने के बावजूद उन्होंने सत्ता और वैभव को ठुकराकर प्रभु श्रीराम की चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान किया।

भरत जी का जीवन सिखाता है कि परिवार में बड़ा वह नहीं, जिसके पास अधिक अधिकार हों, बल्कि वह है जो अपनों के लिए अधिक त्याग करे। जहां प्रेम होता है, वहां स्वार्थ समाप्त हो जाता है।

प्रभन्जनानंद ने जटायु प्रसंग के माध्यम से परोपकार और कर्तव्य की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि वृद्ध और शक्तिहीन होने के बावजूद जटायु ने माता सीता की रक्षा के लिए अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया।

यह बताता है कि असहाय की रक्षा करना और जरूरतमंद की सहायता करना भी सच्चा धर्म है।

वहीं, शबरी की भक्ति का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि भगवान भाव के भूखे हैं, वैभव के नहीं। शबरी के पास कोई सांसारिक संपत्ति नहीं थी, लेकिन उनके हृदय में प्रभु के प्रति अटूट श्रद्धा और निर्मल प्रेम था।

भगवान श्रीराम ने उनके प्रेम को स्वीकार कर नवधा भक्ति का उपदेश दिया। इससे स्पष्ट है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए धनवान नहीं, भाववान बनना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि अहंकार मनुष्य को समाज और ईश्वर से दूर करता है, जबकि विनम्रता उसे सबके निकट लाती है। जीवन की सार्थकता केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के काम आने में है।

अंत में उन्होंने कहा कि श्रीराम कथा तभी सार्थक है, जब इसके आदर्श हमारे विचारों के साथ-साथ आचरण में भी दिखाई दें।

