स्वामी प्रभंजनानंद शरण बोले—पद नहीं, संस्कार बनाते हैं महान!

श्रीराम कथा के दूसरे दिन श्रद्धालुओं को मिला जीवन की वास्तविक संपत्ति का संदेश, विनम्रता, मर्यादा और परोपकार को बताया महानता की पहचान
Report by Nawada News Xpress/ नवादा / सूरज कुमार
नवादा। गांधी इंटर विद्यालय के प्रांगण में श्रीराम कृष्ण कथा परिवार की ओर से आयोजित श्रीराम कथा के दूसरे दिन अयोध्या से पधारे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध कथा व्यास पूज्य डॉ. स्वामी प्रभंजनानंद शरण जी महाराज ने श्रद्धालुओं को जीवन की वास्तविक संपत्ति का बोध कराया।

उन्होंने प्रभु श्रीराम के आदर्शों के माध्यम से समझाया कि मनुष्य की असली महानता ऊंचे पद और धन-दौलत में नहीं, बल्कि उसके संस्कार, विनम्रता और श्रेष्ठ आचरण में निहित है।

स्वामी जी ने कहा कि प्रभु श्रीराम का जीवन प्रेम, मर्यादा और बड़ों के प्रति सम्मान की प्रेरणा देता है। व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न बन जाए, यदि उसके भीतर विनम्रता नहीं है, तो उसकी महानता अधूरी है। सम्मान पद से नहीं, बल्कि व्यवहार और कर्मों से मिलता है।

उन्होंने संदेश दिया कि शक्ति का उपयोग अहंकार के लिए नहीं, बल्कि निर्बलों की रक्षा और अन्याय के विरोध के लिए करना चाहिए। धन, योग्यता और प्रभाव तभी सार्थक हैं, जब उनसे जरूरतमंदों का भला हो सके।

कथा व्यास ने कहा कि किसी व्यक्ति की वर्तमान परिस्थितियों या पुरानी गलतियों के आधार पर उसके भविष्य का आकलन नहीं करना चाहिए। प्रेम, करुणा और सद्भाव से निराश व्यक्ति के जीवन में भी आशा की नई किरण जगाई जा सकती है। दूसरों का अपमान करने के बजाय सम्मान और सहयोग देकर उन्हें सही राह दिखाना चाहिए।

गुरुजनों के मार्गदर्शन और अनुशासन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सीखने की भावना ही व्यक्ति के विकास का आधार है। प्रभु श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारने का सच्चा अर्थ यही है कि हमारे व्यवहार से किसी के चेहरे पर मुस्कान आए, शब्दों से निराश व्यक्ति को हिम्मत मिले और कर्मों से किसी के जीवन में नई उम्मीद जगे।



