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हज पर जाने से पहले जान लें इल्म और एहतियात क्यों है ज़रूरी

हज ट्रेनिंग प्रोग्राम में उलेमा ने बताए हज के बुनियादी उसूल, अदब और मनाही, साथ ही नबी करीम ﷺ की बारगाह में सलाम और दुआ का खास एहतमाम करने का दिया गया नसीहत

Report by Nawada News Xpress / नवादा / सूरज कुमार

नवादा जिला मुख्यालय स्थित मजलिस-ए-उलेमा एवं उलमा जिला नवादा के तत्वावधान में आयोजित हज ट्रेनिंग प्रोग्राम में उलेमा-ए-किराम ने हज पर जाने वाले जायरीनों को हज की बुनियादी बातें, अदब और ज़रूरी एहतियातें समझाईं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हाफ़िज़ मौलाना अज़ीमुद्दीन नदवी ने कहा कि अल्लाह तआला का किसी को हज के लिए चुनना बहुत बड़ी नेमत है। हज जितनी नेक इबादत है, शैतान उतनी ही कोशिश करता है कि इसकी रूहानियत कम कर दे। इसलिए हाजी को पूरे सफ़र में इख़लास, नरमी और हया के साथ रहना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हज पर निकलते समय दिल में यह एहसास रहे कि हम अल्लाह के मेहमान हैं। एहराम बांधने के बाद तलबिया पढ़ते रहना चाहिए और हर काम शरई हुदूद में रहकर करना चाहिए। जब काबा पहली बार नज़र आए, तो यह दुआओं की कबूलियत का खास वक्त होता है।

अनावश्यक खर्च और समय की बर्बादी से बचने की नसीहत

मजलिस-ए-उलेमा के कार्यालय सचिव मुफ्ती इनायतुल्लाह कासमी ने कहा कि आज हज के नाम पर जाने से पहले और लौटने के बाद बेवजह खर्च किया जाता है, जो सही नहीं है। लाखों रुपये खर्च कर हज पर जाकर वहां कीमती समय बर्बाद करना भी हमारी लापरवाही का नतीजा है। हज को इबादत की तरह अदा करना चाहिए, न कि दिखावे की तरह।

एहराम की हालत में क्या करें, क्या न करें

मदरसा कासिम उलूम तकिया नवादा के नाज़िम मौलाना तैयब कासमी ने हज के फ़र्ज़, वाजिब और मनाही को सरल भाषा में समझाया। उन्होंने बताया कि एहराम की हालत में इत्र, खुशबूदार साबुन, क्रीम या किसी भी सुगंधित चीज़ का इस्तेमाल मना है। नाखून काटना, बाल हटाना या काटना भी जायज़ नहीं है। इस दौरान पति-पत्नी के बीच संबंध भी मना हैं। मर्दों के लिए सिले हुए कपड़े पहनना और टखनों को ढकना मना है, वहीं मर्द और औरत—दोनों के लिए चेहरा ढकना हराम है।

मदीना में अदब और इबादत पर ज़ोर

कारी अनवर ज़की ने मदीना शरीफ़ में 40 नमाज़ें जमात के साथ पढ़ने की अहमियत बताई। उन्होंने कहा कि रियाद-उल-जन्नत में जाने की कोशिश ज़रूर करें, लेकिन किसी को तकलीफ़ न दें। वीडियो बनाने और दिखावे से बचें। नबी करीम ﷺ की बारगाह में सलाम और दुआ का खास एहतमाम करें—अपने लिए, माता-पिता और रिश्तेदारों के लिए। क़ुबा और क़िबलतैन मस्जिद में भी दो रकअत नमाज़ अदा करें।

व्यावहारिक प्रशिक्षण और अनुभव साझा

हाजी सैफुर रहमान ने एहराम पहनने का तरीका सिखाया, जबकि हाजी सैयद इस्फ़हान उर्फ़ लड्डू ने अपने हज अनुभव साझा किए। कार्यक्रम का समापन हाफ़िज़ अल-हज्ज मौलाना अज़ीमुद्दीन नदवी की दुआ के साथ हुआ। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम हज पर जाने वाले जायरीनों के लिए मार्गदर्शक साबित हुआ और उन्हें हज को सही तरीके से अदा करने की अहम सीख दी।

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