ई-रजिस्ट्री के विरोध में नवादा का निबंधन कार्यालय पड़ा सुस्त, 70-80 की जगह महज 5-6 दस्तावेजों की रजिस्ट्री!

17 अगस्त से वासिका नवीसों का असहयोग जारी, 11 सितंबर के हाईकोर्ट फैसले पर टिकी निगाहें; रजिस्ट्री का काम प्रभावित होने से सरकार को भी राजस्व का झटका
Report by Nawada News Xpress/ नवादा / सूरज कुमार
नवादा। सरकार की ओर से लागू की गई ऑनलाइन ई-रजिस्ट्री और पेपरलेस निबंधन व्यवस्था के विरोध में वासिका नवीसों और स्टांप वेंडरों के असहयोग आंदोलन का सीधा असर नवादा के निबंधन कार्यालय पर दिखाई देने लगा है। कभी जहां प्रतिदिन 70 से 80 दस्तावेजों का निबंधन होता था, वहीं अब यह संख्या घटकर महज 5-6 दस्तावेजों तक पहुंच गई है। निबंधन कार्यालय में सन्नाटा पसरा है और जमीन-मकान की खरीद-बिक्री से जुड़े लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
वासिका नवीस संघ के जिलाध्यक्ष विद्या सागर ने कहा कि वे लोग तकनीकी रूप से हड़ताल पर नहीं हैं, लेकिन दस्तावेज निबंधन में असहयोग करना आंदोलन का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि पेपरलेस रजिस्ट्री व्यवस्था के विरोध में मुजफ्फरपुर समेत बिहार के विभिन्न जिलों में कातिबों और स्टांप वेंडरों का आंदोलन जारी है।

17 अगस्त से निबंधन कार्य में असहयोग
पेपरलेस रजिस्ट्री व्यवस्था के विरोध में 17 अगस्त से वासिका नवीसों और स्टांप वेंडरों द्वारा निबंधन कार्य में असहयोग किया जा रहा है। इसका असर जमीन और संपत्ति की खरीद-बिक्री से जुड़े लोगों पर पड़ रहा है। लगातार निबंधन कार्य प्रभावित होने के कारण कई लोगों के जरूरी दस्तावेजों का काम अटक गया है।

11 सितंबर पर टिकी निगाहें
इस पूरे मामले को लेकर पटना हाईकोर्ट में सुनवाई होनी है। 31 अगस्त को अंतरिम फैसला आने की उम्मीद थी, लेकिन विभिन्न जिलों से दायर याचिकाओं की एक साथ सुनवाई के लिए अदालत ने अगली तारीख 11 सितंबर तय की है। अब वासिका नवीस और स्टांप वेंडर हाईकोर्ट के फैसले के बाद ही आंदोलन की आगे की रणनीति तय करने की बात कह रहे हैं।

आखिर पेपरलेस रजिस्ट्री का विरोध क्यों?
वासिका नवीस संघ और दस्तावेज लेखकों का दावा है कि नई डिजिटल व्यवस्था में कई तकनीकी और व्यावहारिक परेशानियां हैं। उनका कहना है कि इससे उनकी आजीविका पर संकट खड़ा हो रहा है। दस्तावेज लेखक, टाइपिस्ट और स्टांप वेंडर भी नई व्यवस्था को लेकर विरोध जता रहे हैं।
ग्रामीण क्रेताओं के सामने तकनीकी परेशानी
संघ का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले कई क्रेता-विक्रेता डिजिटल प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। मोबाइल नंबर आधार से लिंक नहीं होने की स्थिति में ओटीपी आधारित सत्यापन में भी परेशानी आने का दावा किया जा रहा है।
बीघा-कट्ठा से डिसमिल में जमीन का हिसाब, रकबे को लेकर भी सवाल
वासिका नवीसों का कहना है कि पहले जमीन का विवरण बीघा, कट्ठा और धुर में दर्ज किया जाता था, जबकि नई व्यवस्था में इसे डिसमिल में बदला जा रहा है। उनका आरोप है कि कंप्यूटर में दशमलव के बाद रकबा दर्ज करने के दौरान विसंगतियां आने की आशंका बनी रहती है।

साइबर फर्जीवाड़े का भी जताया जा रहा डर
संघ के अनुसार पेपरलेस व्यवस्था में भौतिक दस्तावेज और हस्ताक्षर की भूमिका कम होने से आम लोगों में साइबर ठगी और फर्जीवाड़े को लेकर आशंका बढ़ी है। हालांकि ये दावे आंदोलनरत वासिका नवीसों और दस्तावेज लेखकों की ओर से किए जा रहे हैं।
लोन और सर्विस चार्ज को लेकर भी आपत्ति
संघ का दावा है कि कुछ बैंकों में पेपरलेस दस्तावेजों के आधार पर लोन लेने में परेशानी आ रही है। इसके अलावा सर्विस चार्ज को 500 रुपये से बढ़ाकर 1000 रुपये किए जाने पर भी आपत्ति जताई जा रही है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इससे आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

रजिस्ट्री घटने से सरकारी राजस्व पर भी असर
निबंधन कार्य प्रभावित होने का असर सरकारी राजस्व पर भी पड़ रहा है। लगातार कम दस्तावेजों का निबंधन होने से राजस्व संग्रह में कमी की बात सामने आ रही है। जमीन और संपत्ति के निबंधन से जुड़े लोगों के साथ-साथ सरकारी खजाने पर भी इसका असर पड़ने की बात कही जा रही है।
क्या कहते हैं जिला निबंधन पदाधिकारी?
जिला निबंधन पदाधिकारी अजय कुमार सिंह ने बताया कि वासिका नवीसों के असहयोग के कारण दस्तावेज निबंधन प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि पेपरलेस व्यवस्था लागू होने और वासिका नवीसों के असहयोग से पहले जहां प्रतिदिन करीब 70 से 80 दस्तावेजों का निबंधन होता था, वहीं अब महज 5-6 दस्तावेजों का ही निबंधन हो पा रहा है। कम दस्तावेजों के निबंधन के कारण सरकारी राजस्व को भी काफी नुकसान हो रहा है।

