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मकर संक्रांति पर क्यों बनती है खिचड़ी? एक कटोरी में छिपा है ग्रहों का संतुलन और इतिहास की जीत!

सिर्फ परंपरा नहीं, खिचड़ी है ज्योतिष, पोषण और संघर्ष की विजयगाथा

Report by Nawada News Xpress / नवादा / सूरज कुमार

क्या आपने कभी सोचा है कि मकर संक्रांति पर बनने वाली साधारण-सी दिखने वाली खिचड़ी आखिर इतनी खास क्यों मानी जाती है? क्यों इसे खाने और दान करने से ग्रहों की दशा मजबूत होने की मान्यता है? और कैसे एक व्यंजन ने न सिर्फ भूख मिटाई, बल्कि आतंक के खिलाफ संघर्ष में भी ताकत दी? खिचड़ी की इस परंपरा के पीछे छिपी है आस्था, ज्योतिष और इतिहास की रोचक कहानी।

खिचड़ी: ग्रहों को मजबूत करने वाला महाप्रसाद

खिचड़ी के महत्व पर पंडित विद्याधर शास्त्री बताते हैं कि मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाना, खाना और दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इसी कारण देश के कई हिस्सों में मकर संक्रांति को “खिचड़ी पर्व” भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार, खिचड़ी में प्रयुक्त हर सामग्री का विशेष ज्योतिषीय महत्व है। चावल को चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है, काली उड़द की दाल शनि का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि हरी सब्जियां बुध ग्रह का संकेत मानी जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति पर खिचड़ी का सेवन करने से कुंडली में ग्रहों की स्थिति मजबूत होती है और जीवन में संतुलन आता है। इसीलिए इस दिन चावल, काली उड़द की दाल, नमक, हल्दी, मटर और मौसमी सब्जियों से खिचड़ी बनाई जाती है।

कैसे शुरू हुई खिचड़ी की परंपरा?

पंडित विद्याधर शास्त्री के अनुसार, मकर संक्रांति पर खिचड़ी बनाने की परंपरा की शुरुआत बाबा गोरखनाथ ने की थी। मान्यता है कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को लगातार संघर्ष करना पड़ता था, जिसके कारण उन्हें भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इससे योगी कमजोर होते जा रहे थे। नाथ योगियों की इस दयनीय स्थिति को देखकर बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जियों को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह व्यंजन न सिर्फ जल्दी तैयार हो जाता था, बल्कि पौष्टिक और ऊर्जा से भरपूर भी था। इससे योगियों को तुरंत ताकत मिलती थी।

खिचड़ी बनी संघर्ष की शक्ति

यह व्यंजन नाथ योगियों को इतना पसंद आया कि बाबा गोरखनाथ ने इसका नाम “खिचड़ी” रखा। झटपट बनने वाली खिचड़ी ने योगियों की भोजन की समस्या को दूर कर दिया। परिणामस्वरूप वे पुनः सशक्त होकर खिलजी के आतंक का मुकाबला करने में सफल हुए। खिलजी से मुक्ति मिलने के कारण गोरखपुर में मकर संक्रांति को “विजय दर्शन पर्व” के रूप में भी मनाया जाता है।

गोरखपुर का खिचड़ी मेला और आस्था का सैलाब

मकर संक्रांति के दिन गोरखनाथ मंदिर के पास प्रसिद्ध खिचड़ी मेले का आयोजन होता है। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। यही कारण है कि खिचड़ी सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और विजय का प्रतीक बन चुकी है।

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